मैं एक नदी बहना चाहता हूँ मैं नहीं चाहता कि एक तालाब बनूँ ज़िंदगीभर मैं नहीं चाहता कि आदिम काई पालकर पोखर बनकर जमा रहूँ ज़िंदगीभर दूषित बनूँ दुर्गंधित बनूँ निश्चित सीमा भीतर रहूँ निश्चित आयतन में रमा रहूँ मैं नहीं चाहता कि मैं गतिहीन कुँवा बनूँ कुँवे का अचल पानी बनूँ उठाया जाऊँ अदृश्य हाथों से वाष्पीकृत हो जाऊँ और ज़िंदगी खत्म करूँ। मैं नदी बनना चाहता हूँ हर दिन ज़िंदगी के किनारों को बदलना चाहता हूँ ज़िंदगीभर यात्रा चाहता हूँ यात्राभर ज़िंदगी चाहता हूँ मुझे स्वीकार्य नहीं जीने की ये जड़ परंपराएँ। अनिश्चित ही सही मैं नदी बनना चाहता हूँ मैं नदी बहना चाहता हूँ। ¬¬ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी नपुंसक ? दुर्भाग्य ! मेरा मेरे बाहर ऐसा 'क्या यह 'खिडकी मैं पहले वह 'इसका 'यह 'लीजिए, 'पैदल 'घंटेभर में आ जाऊँगा।' 'और टैक्सी 'लौटते 'उस अब 'गहने 'नहीं, 'ये 'जरूरत मैं दोपहर 'इस 'हाँ, 'आपके 'हाँ, 'नीचे वह 'और 'ऐसा 'क्यों भला 'यहाँ 'यह 'असली 'कहिए।' 'पहले ¬ हमलोग 'असली 'मैं हम 'कमरे 'और 'किराया 'दूसरों 'ऐसा 'सच ! मेहमान 'इस 'आप 'इस 'गज़ब अभी तक 'आप करते क्या हैं?' 'मैं वकील हूँ।' 'सरकारी वकील?' 'नहीं, मैं व्यावसायिक वकील हूँ।' 'तो आपका अपना लॉ फॉर्म है?' 'नहीं हमारा संयुक्त लॉ फॉर्म है।' 'अकेले रहते हैं?' 'मेरा परिवार है, उन्हीं के साथ रहता हूँ।' 'कितने सदस्य हैं परिवार में?' 'पत्नी और बच्चे हैं।' 'बच्चे कितने हैं?' 'पाँच लड़कियाँ।' 'पाँच लड़कियाँ?' 'हाँ !' 'अब भी बेटे की आस सजाए हैं?' 'यह तो नितांत व्यक्तिगत प्रश्न पूछा आपने। मगर मैं रूठूंगा नहीं। आपने ठीक ही कहा है।' मैं पहले ही कह चूका हूँ उसकी तार्किक क्षमता मुझे अच्छी लग रही है। उसे मेरे यहाँ रहना होगा। छत्ता बढा है उसका। उसे मेरे बंजर जमीन पर खाद पानी देना ही होगा। ¬ 'आदमी तो ठीक लगता है। पर बच्चे कितने? बीवी फिर पेट से है।' मेरी पत्नी का चेहरा बुझा हुआ है। 'फिक्र करने की जरूरत नहीं यह आदमी ज्यादा दिन नहीं टिकने वाला।' मैंने हिम्मत बंधाई। 'क्यों?' उसकी आँखें सवाल करती हैं। हमारे यहाँ ठहरनेवाला आदमी कम से कम एक दशक तो ठहरा ही है। इसका भी रिकार्ड है। 'क्योंकि यह वकील है।' 'वकील एक मकान में लंबे समय तक नहीं ठहरते क्या?' 'देखो मेरी जान ! मुल्क में भ्रष्ट मंत्री और स्मगलर काफी हैं। उनमें से बहुतों के मुकदमे होंगे। दो चार ऐसे मुकदमे हाथ लग गये तो यह आदमी मालामाल हो जाएगा। और फिर अपना मकान बनवाएगा और चला जाएगा।' पत्नीको विश्वास करने की वजह मिल गई थी। उसे मालूम था हम जिस शहर में बसे हैं उसका अस्तित्व ही इन्ही तीन किस्म के लोगों में टिका है। वह एक बरस तक नहीं गया। मैंने सोचा, उसे आशातीत मुकदमे नहीं मिले। फिर एक बच्ची बढ़ गई उसके परिवार में। 'दूसरे साल तो चला ही जाएगा' हमने सोचा। वह नहीं गया। तीसरे साल भी वह टिका रहा। हम उसकी वकालती पर शक करने लगे। 'अब हम आपका मकान छोड़ रहे हैं।' चौथे साल उसने ऐलान किया। 'बधाई हो ! दूसरों को यह मकान छोड़कर अपना मकान बनवाने में दश बरस लगे। लेकिन आपने तो तीन बरस में ही यह कारनामा कर दिखाया।' 'आपका अंदेशा गलत है। मैं अपना नया मकान बनाकर नहीं जा रहा। मैं तो अपने पुस्तैनी मकान में जा रहा हूँ।' 'पहाड़ में?' 'हाँ !' 'आपने मेरे अंदेशे को गलत ठहराया। कोई भी आदमी इस शहर में आने के बाद लौटकर नहीं गया है, बल्कि कई तो विदेश गए हैं। अमरिका व जापान की तरफ गए हैं।' मैंने उसे इस शहर का तीन सौ बरस का इतिहास स्मरण कराया। 'मैं अलग रास्ते पर चलना चाहता हूँ।' 'बताइए कौन सा अलग रास्ता?' 'वह मैं अभी नहीं बताऊँगा। बताने का कोई अर्थ नहीं है। मैं अपने गाँव लौट रहा हूँ।' 'नहीं माड़साहब ! मुझे तो आपकी योजना बिलकुल पसंद नहीं आई। आपलोगों के लिए यह शहर स्वर्ग है। एक स्मगलर नहीं तो एक भ्रष्ट मंत्री का मुकदमा आपको मिल जाए तो, ज़िंदगी भर के लिए काफी है। ऐसी जगह छोड़ के माड़साहब भी.........।' 'रूपये कमाने, मकान बनवाने और मौजमस्ति करने के अलावा और भी बहुत काम हैं इस संसार में। तरस आता है मुझे आपकी बुद्धि पर।' उसने मेरी बोलती बन्द कर दी। वह अपने इरादे में खरा उतरा। अपने बीवी बच्चों के साथ एक दिन सबेरे ही मेरा कमरा खाली कर दिया। उसकी बीवी के आँखों में आँसू थे। बच्चियों के भी आँखे नम थीं। मेरी पत्नी भी अपने को संभाल नहीं पाई। सब भावनाओं मे बहे जा रहे थे। 'आप मेरे मकान आएँ। मेरी योजना क्या है अपनी आँखों से देखें।' उसने कहा। यह निमंत्रण सिर्फ औपचारिकता नहीं थी। वह ही नहीं बल्कि उसके परिवार के अन्य सदस्य भी हमारे यहाँ बारबार फोन करते। उसने पूछना नहीं छोड़ा - आप कब आएँगे?' तीन बरस बीत गए। उसके बारबार के आग्रह के सामने खड़ा हूँ मैं। ज़िंदगी बिना काम के ही बीत रही है। पर्यटक बनने का साहस नहीं है। शहर छोड़कर कहीं गया हूँ कभी। इसबार जाने की तारिख का ही ऐलान कर दिया मैंने। उसने मुझे पता दिया था। उसके बाल-बच्चे और बीबी के लिए उपहार खरीदे। प्लेन से जाने से व़क्त तो कम लगता पर मैं कुछ पैसों की बचत करना चाह रहा था। प्राकृतिक सुंदरता पान करने के लिए अच्छा मौका था। थानकोट पार करने तुरंत बाद ही मुझे साफ हवा मिली और मैं आनंदित अनुभव करने लगा। ¬ मेरे लिए उसने एक अलग कमरे की व्यवस्था की। उसके रसोई में मैं खाना खा लेता। सुबह तड़के ही वह मुझे जगाने आ जाता। दो घंटे त हम तक साथ टहलते। उसके बाद वह अपने काम में लग जाता, जो पुराना ही काम था। यहाँ उसने थोड़ा सा परिवर्तन किया था। गरिबों के मुकदमे वह मुफ़्त में देखता था। इसीलिए उसके ऑफिस में भीड़ लगी रहती थी। हर दिन हाथ जोड़कर रोते हुए लोग मिल जाते। पैसेवालों से वह अच्छी फीस लेता था। जिले में वह काफी लोकप्रिय हो गया था। 'इनमें से पच्चीस फीसदी लोगों को न्याय दिला सका तो यह मेरी सफलता होगी।' उसने कहा। जिला मुख्यालय में भी उसने मकान नहीं बनवाया था। उसका पुस्तैनी मकान वहाँ से बहुत दूर था। 'मेरी संपत्ति तो ये हैं।' गरिबों की भीड़ दिखाते हुए उसने कहा। 'मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस् मैं इन लोगों को न्याय दिलवा सकूँ।' वह कहता था। मैंने उसकी सपने की दूनिया देखी। उसके नये सिद्धांत के मायने देखे। उसके आदर्शका रूप देखा। उसका यह रूप मेरे मकान में रहते व़क्त कभी दिखाई नहीं दिया था। मैं यहाँ तकररीबन एक महिना बिता चुका हूँ। सबेरे ही मैं उसके साथ सैर के लिए निकला हूँ। मकान से कुछ ही दूरी तय कर पाए हैँ कि एक आदमी सामने से आता हुआ दिखाई देता है। वह पास आकर उसे गोली मारता है। कई राउंड फायरिंग करता है। वह गिर जाता है। मैं चिल्ला उठता हूँ और उसे पकड़ने लगता हूँ। कई लोग जमा होते हैँ। वह मर गया है। लाश उठवाने और उसकी बीबी को आशौच मे रखने की तैयारियाँ हो रही हैँ। सब रो रहे हैँ। मेरी भी आँखें भीग गई हैं। गरीब लोग एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं और आँसूओँ की नदियाँ बह रही हैं। दूसरे दिन ही मैंने उसका मकान छोड़ दिया। वह अलग किस्म की जीवनशैली अपनाने के लिए गाँव लौटा था। उसका अंत भी अलग किस्म से हो गया। मेरे मकान ¬¬ नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी रिश्ता ? डॉ. रवीन्द्र समीर वह मुझे अपनी सुख-दुःख की कहानियाँ सुनाया करता है। मैं भी मेरे हर पल उसी पर न्यौछावर करती हूँ। घर परिवार गुप्त बातें, पति-पत्नी के अंतरंग संबंध की बातें भी हम एक दूसरे के सामने रखते हैं क्योंकि हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है। ¬¬ नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
? भूपिन व्याकुल
ध्रुब
सापकोटा
बहुत
दिनों
से
मेरा
मकान
खाली
पड़ा है।
मेरी
आमदनी
का
जरिया, जीवन
निर्वाह
का
स्रोत
!
कुछेक
साल पहले
तक
मैं
इसको
ज्यादा
महत्त्व
नहीं
देता
था।
यह
मेरी
अतिरिक्त
आमदनी
थी।
प्रमुखता
पगार
की
थी।
मेरा
ऑफिस
समृद्ध
था।
देखते-देखते
ऑफिस
दिवालिया
हो
गया।
मुझे
अनिवार्य
अवकाश
देते
वक़्त
तक
तो
ऑफिस
की
पेंसन
देने
की
क्षमता
बरकरार
थी।
मेरे
रिटायमेंट को
भी
पाँच
बरस
हो
चुके
हैं।
पहले
पहले
तो
मैं
यथासमय
पेंसन
आया
करता
था।
अब
तो
अनियमितता
ने
जगह
बना
ली
है।
सुनता
हूँ
पेंसन
की
व्यवस्था
ही
समाप्त
करने
की
प्रक्रिया
चल
रही
है।
मकान
दूमन्जिला
है।
एक
में
मैं
रहता
हूँ
और
दूसरा
किराए
के
लिए
है।
मकान
में
किराए
रहनेवाले
लोग, अपना
मकान
बनवाकर
ही
जाते
हैं।
मैं
हर
नए आनेवाले को
सुनाता
हूँ।
एक
आकर्षण
पेश
करता
हूँ।
मेरी
यह
शैली
अब
तक
तो
काम
कर
रही
थी।
कमरा कभी
खाली
रहता
था।
पर
इसबार
वह
कमरा
खाली
पड़ा है।
मेरा
वह
आकर्षक विज्ञापन
डैट एक्सपायर्ड
दवा
की
तरह
हो
जया
है।
लिख
देते
है 'कमरा
किराए
पर',
धर्मपत्नीका
सुझाव
है। लेकिन मुझे
उसके
प्रस्ताव
पर
भरोसा
नहीं
है।
नहीं
है
की
लोग
आते
ही
नहीं
थे।
कभी
कभार
आ
टपकते
थे।
उन्हें उकसाने
के
लिए
मैं
कह
उठता
यहाँ
से
जानेवाले
लोग
इससे
सुंदर
व
बढ़िया
मकान
बनवाकर
गए
हैं।
जब
यह
नारा
भी
बेकाम
हो
चला
तो
धर्मपत्नी
ने
बोर्ड
लटकाने
का
सुझाव
दिया।
मैंने
तो
लोगों
को
सच्ची
बातें
ही
सुनाई
थी।
वे
विश्वास
क्यों नहीं
करते - मैं
क्या
करु
?
तरकीब
रंग
लाएगी ?'
मैं
उससे
पूछता
हूँ।
दूसरा
विकल्प
न
देखकर
ही
मैंने
यह
सवाल
किया
है उससे।
में
एक और दूसरा
दीवार
में
लटका
देते
हैं'
वह
कह
उठती
है।
कागज
खरीदता लाता
हूँ।
लाल स्याही और
कलम
लेता
हूँ।
मेरी
हस्तलिपि
अच्छी
नहीं
है। जबतक
नौकरी
की
अच्छी हस्ततिपि
की
जरुरत
कभी
नहीं
पड़ी।
नौकरी
छूटने
पर
लिखाइ
का
काम
पूरी
तरह
ठप
हो
गया।
मैंने ही
नेपाली
में
लिखा
और
कागज को
खिडकी
में
चिपका
दिया।
गोंद
नहीं
था, पके चावल
से
काम
लिया।
दूसरा
कागज
दीवार
पर
चिपका
दिया।
सड़क
पर
पहुँच
कर
अपने
लिखे
हुए
कागज
को
आगंतुक
की
तरह
देखने
लगा।
मैं
फिर
कमरे
में
लौट
आया।
तीसरा
कागज
अंग्रेजी
में
तैयार
किया
और
उसे
भी
दीवार
में
पहले
कागज
के
बगल
में
चिपका
दिया।
अंत
में
धर्मपत्नी को
बुलाया
दिखाने के लिए।
कहने
लगी
'विदेशी
तो
आने
से
रहे।
बेकार
में
स्याही
और
कागज
जाया
किया।'
एक
मनोवैज्ञानिक
कारण
तो
है।
यह
मकान
किसी
ऐरेगैरे
का
नहीं
है।
आधुनिक
लोगों
का
है।'
मैं
कह
उठा
और
वह
हँसने
लगी।
वह
भी
अपने
को 'ऐरेगैरे' में
शामिल
करने
को
तैयार
नहीं
है।
हमारा
मकान
पुराना
ही
सही
लेकिन
है
बहुत
महत्त्वपूर्ण'
इस
बात
को
दर्शाने
के
लिए
हम
ने
कोई
कसर
बाकी
नहीं
छोड़ी
थी।
किराए
पर
देने
के
लिए
नियम
बनाए
थे।
जैसे
नौकरीसुदा
हो, सपरिवार
हो
और
किसी
का
सिफ़ारिश
लेकर
आए।
पर
यह
मकान
बहुत
दिनों
से
खाली
पड़ा
है।
हमारे
बनाये
नियम
हम
ही
तोड़ने
के
लिए
तैयार
हैं।
सिर्फ आदमी
चाहिए- जो
किराए
पर
लें।
अब
सिर्फ यही
एक नियम
बचा
है।
इन्हें
बेच
दें।'
पत्नी
अलमारी
से
गहने
निकाल
कर
देती
है।
मैं
सोने
के
गहने
ले
लेता
हूँ।
यह
बड़े
संकट
का
सूचक
है।
जाइएगा।'
वह
कहती
है।
मैं
कहता
हूँ।
क्या
काम
है ?'
पत्नी
कहती
है।
'बस
में
गहने
चारी
हो
सकते
हैं।'
वह
मुझे
हिदायत देती है।
के
लिए
पैसे
मांगने
कि
हिम्मत
मुझमें
नहीं
है।
हमारी
क्षमता
बॉयबॉय
कर
चुकी
है।
वक़्त
टैक्सी
लेलें।'
वह
कहती है।
उसे
फिक्र
है
मैं
ज्यादा
थक
न
जाऊँ।
वक़्त
तो
मैं
पैसेवाला
बन
जाऊँगा
तुम्हें
कहने
की
जरूरत
ही
नहीं
है।'
मैं
कहता
हूँ।
मैं
सड़क
पर
हूँ।
सड़क
में
लोगों
की
भीड़
है।
मैं
उसी
भीड़
का
हिस्सा
बन
जाता
हूँ।
ज़िंदगी
भर
मैं
इसी
भीड़
का
हिस्सा
तो
था।
अब
इस
जीवन
के
उत्तरार्द्ध
में
कौन सी तबदीली
होगी ?
इस
भीड़
में
कोई
अंदाजा
नहीं
लगा
सकता
हाथ-मुँह
जोड़ने
के
लिए
कोई
गहने
बेचने
चला
है।
कोई
अनुमान
ही
नहीं
कर
पाएगा
जीवन
भर
नौकरी
करनेवाला
आदमी
हाथ-मुँह
जोड़ने
की
समस्या
से
परेशान
है।
गिरवी
रखने
है ?'
दूकानदार
पूछता
है।
बेचने
हैं।'
मैं
कहता
हूँ।
गहने
तो
बहुत
अच्छे
हैं।'
वह
फिर
कहता
है।
होगी
तो
फिर
बनवा
लूँगा।
मैं
जवाब
देता
हूँ।
रुपये
लेता
हूँ।
मैं
अब
धनी
बन गया
हूँ।
बहुत
दिनों
से
मैंने
होटल
में
नहीं
खाया
है।
मैं
होटल में चला
जाता
हूँ
और
नास्ता
करता
हूँ।
अखबार
पढ़े
भी
महिनों
बीत
गए, पत्रिकाएँ
खरीदता
हूँ।
सड़क
मे
प्रतिगमन
विरुद्ध
जुलूस
निकला
हुआ
है।
टैक्सी
मिलने
की
संभावना
कम
है।
मैं
पैदल
ही
घर लौटता हूँ।
उस
रात
मुझे
चैन
की
नींद
आती
है।
का
समय
होगा।
मैं
कमरे
में
ही
पड़ा
हूँ।
घरवाली
ने
चाय
बनाकर
दी
है।
कालबेल
बजाता
है
कोई।
बाहर
निकलने
पर
देखता
हूँ
अपरिचित
अधेड़
है
सामने।
मकान
के
मालिक
आप
ही
हैं
?'
वह
पूछता
है।
मैं
ही
हूँ।'
मैं
जवाब
देता
हूँ।
मकान
में
कमरा
किराए
पर
है?'
वह
फिर
पूछता
है।
हैं।'
मैं
कहता
हूँ।
या
ऊपर ?'
वह
पूछता
है।
लगता
है
विज्ञापन से
यह
बात
स्पष्ट
नहीं हो पाई।
कमरे
देखता
है।
खिड़कियाँ
देखता
है।
उन्हें
खोलता
है, बंद
करता
है।
बिजली
के
स्वीच
टटोलता
है।
फिर
वह
दरवाजे
खोलता
है
और
बन्द
करता
है।
सब
तो
ठीक
है।
टॉयलेट और स्नानागार नीचे
हैं।
बरसात में
या
रातको
नीचे-ऊपर
करना तकलीफ
देह
है।'
वह
बोलता
है।
मैंने
जानबूझकर
बनवाया
है।'
?'
पानी
की
किल्लत
तो
आपको
मालूम ही
है।
सफ़ाई
व
स्वास्थ्य
की
दृष्टि
से
कमरे
से
दूर
बनाया
है।'
तो
कोई
बात
नहीं
हुई।
साफ
करने
से
तो
सफ़ाई हो
ही
जाती।
शायद
कुछ और
ही
वजह
हो?'
आदमी
तार्किक
लगता
है
और
स्पष्टवक्ता
भी।
वजह
जानना
चाहते
हैं?
कमरे
देख
लें।'
नीचे
उतरते
हैं।
मैंने
एक
कमरे
को
बैठक
बनाया
है।
उसी
कमरे
में
हम
लोग
बैठ
जाते
हैं।
पत्नी
चाय
ले
आती
है।
यह
स्थिति
हमारे
लिए
बिलकुल
नई
थी।
पहले
कभी
हमने
कमरा
देखने
आए
लोगों
को
चाय
से
स्वागत
नहीं
किया
था।
आज
हम
उन्हें
सम्मान
करने
की
अवस्था
तक
पहुँच
गए
हैं।
यह
एक
तरफ
से
अच्छा
भी
है, क्योंकि
इससे
हमारे
बीच
की
दूरियाँ
मिट
गई
हैं।
वजह
सुनेगें ? जिसके
मकान
में
जाने
के
लिए
गाड़ी
का
रास्ता
नहीं
है
उस मकान का मालिक
नहीं कहता की
गाड़ी
का
रास्ता
नहीं
है बल्कि यह
कहता
है
कि प्रदूषण
से
बचने
के
लिए
मैंने
मकान
दूर
बनाया
है।
यह
सौचालय
और
स्नानागार
की
बात
भी
बिलकुल
वैसी
ही
है।'
समझ
गया।
और
व्याख्या
की
जरुरत
नहीं
है।'
वह
कहता
है।
चाय
पी
रहे
हैं।
वह
आदमी
कमरा
लेगा
या
नहीं
यह
बात
स्पष्ट
नहीं
हो
पाई
है।
का
किराया?'
वह
पूछता
है।
मैंने
किराया
पहले
के
मुकाबले
कम
बताया है
और
इस
बात को
पत्नी
से
छिपाइ
भी है।
क्या-क्या
शर्तें हैं
?' उसने
फिर
पूछा।
मुझे
लगा मेरे किराए की बात उसे भा गई है।
एडवांस
और
बिजली
पानी का
अलग।'
के
मुकाबले
आपकी
शर्तें आकर्षक
हैं।'
क्या ?'
नहीं
आ
सकते।
मकान
का
टेलिफोन
इस्तेमाल
नहीं
कर
सकते।
रात
दस
बजे
के
बाद
मकान
में
नहीं
ढूकना।
ऐसी
शर्तें भी
होती
हैं।
मैं
तो
भुक्तभोगी
हूँ, बहुत
मकानों
में
किराए
पर
रह
चुका
हूँ।'
मामले
में
मेरा
कोई
सिद्धांत
नहीं
है।'
मैं
उदार
बनता
हूँ।
यह
आदमी
कमरा
ले
ले
यही
मेरी
इच्छा
है।
मैं नहीं चाहता यह लौट जाए।
अपने
मकान
की
क्या
विशेषता
देखते
हैं?'
कमरे
में
रहनेवाले
लोग
अपना
मकान
बनाकर
ही
यहाँ
से
निकले
हैं।
यह
अब
तक
का
रिकार्ड
है।'
की
बात
है।'
उस
आदमी
ने
कमरा
लेने
की
बात
कही नहीं
है।
आशंकाओं
के
बादल
मेरे
भीतर
उमड़
रहे
हैं।
मेरी
की
उदारता
काम
कर
रही
है
या
नहीं
यह
देखना
है।
उसका
परिचय
लेने
का
कोई
अर्थ
नहीं
है
क्योंकि
वह
निश्चिय
नहीं
कर
पा
रहा
है।
जीवन में सदा सार्थक काम तो होते नहीँ।
का रिकार्ड भी टूट गया। अब मैं कुछ नहीं बोलनेवाला। क्या मैं नपुंसक ही हूँ?
Saturday, October 3, 2009
अंक छब्बीस से
Posted by कुमुद अधिकारी at 7:32 PM 0 comments
अंक पचीस से
कर्फ्यू और सड़क सड़कें अब सिर्फ रास्ते भर न रहीं। एक एक पल में आत्म-पराजित चेहरा लिए किसी चौक में बंद में फँसी सड़कें घंटो तक मूर्दा शांति में रहती हैं। वाह ! अवरोध किसी कथिक नायक को दूसरी पार्टी का दूसरा नेता बना देते हैं। नायक के दलबल तोड़ देती हैं दीवारें स्वतंत्र बनती हैं सड़कें फिर अपने ही दुःस्वप्न ढोकर आदमियों से पराजित हैं। वाह ! कर्फ्यू ! कर्फ्यू अब सड़कों में समा गया है बिडंबना की चादर ओढ़े पराजित है सड़कों में हिप्पी जैसी बन गई है सड़कें जो सर्वोच्चता की आवाजें बोल रहीं हैं। सड़कें ठप बनाती हैं अर्थात् सड़कें ठप बनती हैं आदमी सड़कें नहीं ढोते आदमी सड़कें नहीं सरकाते देश बनानेवाला बंद करता है सड़कें देश बिगाड़नेवाला बंद करता है सड़कें आदेशों से गल गई है सड़कें कर्फ्यू अब हारा हुआ नशेबाज़ बन गया है। ¬¬ नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी सीता – ८ परशु प्रधान घर लौटने पर सीताको एक अजीब सी जलन और बेचैनी हुई – जैसे किसी जहरिले साँप ने काटा हो। कहाँ जाऊँ, क्या करूँ किसे सुनाऊँ ! किससे कहूँ कि दिन में क्या हुआ ! वो अप्रत्याशित घटना। सीता को सीता उस कपड़े की गठरी को खोलने लगी। हर चीज को सीता को वो दंत्यकथा याद आई जिसमें एक लाटोबुंगो सीता ने कपड़े की गठरी को उठाया और अलमारी में रख दिया। पर अलमारीका एक शीशा त टूटा पड़ा है। बाहर से सबकुछ दिखाई देता है। कुछ पल बाद ही वह गठरी पत्थरों के ढेर में बदल गई थी। वही पत्थर जिनसे उसे पटाया और लूटा जा सकता था। उसने फिर गठरी को बाहर निकाला। कहाँ रखूँ इस गठरी को। उनके आने का समय हो रहा है। किस किस बात का जवाब देती फिरे वह ?' न ससुराल के न मायके के ! वे पाँचों आदमी के चेहरे लाटोबुंगो दूसरा जो बोल रहा था वह क्षत्रिय था – 'प्रदीप की बात बिलकुल सही है। आज हम सब सीताजी को कुछ न कुछ भेंट अवश्य दें। आज उनका जन्म दिवस भी है शायद।' सीता चौँक सी गई थी। आज उसका जन्म दिवस है क्या ? शायद हो, या नहीं भी। उसने कहना चाहा – 'मुझे कुछ नहीं चाहिए। सबकुछ है मेरे पास।' लेकिन बात उसकी हलक में अटक गई। इसी तरह दूसरी कोशिश भी बेकार गई। अब उसने खुदसे पूछा – उस वक्त वह क्यों बोल नहीं पाई ? क्यों वह शून्य हो गई ? क्यों गूंगी हो गई ? क्यों उसकी आवाज दबकर रह गई ? वह उतनी कमजोर तो नहीं थी। पर उसकी कमजोरी आज प्रमाणित हो चुकी थी। वह मन ही मन पति को सुनाने के लिए एक संवाद तैयार करने लगी – 'काठमांडू से कुछ साहित्यकार पधारे थे। उन्हीं की गाईड बनकर जोगबनी तक जाना हुआ। बातों ही बातों में वे मुझे उपहार देने लगे। मेरे मना करने पर भी जिद पकड़े रहे। इसलिए यह गठरी बड़ी होती गई। देखेंगे ये कपड़े.....' ये वाक्य उनके लिए संदेहास्पद हो सकते हैं – 'तुमने जरूर माँगा होगा। तब ही बेचारे कवि-लेखकों ने दिए होंगे। नहीं तो उन लेखकों के पास कहाँ से पैसे आएँगे ? औरत की जात। कपड़े देखते ही लोभ पैदा हो गया होगा।' सीता ने उस गठरी को उठाया और रसोईघर की तरफ चल दी। बरतनों की पुरानी अलमारी में एक तरफ उस गठरी को खोंस दिया। ताला लगाने के लिए कोई जगह नहीं थी। 'कुछ दिनों के लिए तो छिपाना ही पड़ेगा। शंकाएँ.. उपशंकाएँ उपज सकती हैं। 'तुम्हारे ही किसी पुराने प्रेमी ने दिए होंगे, क्यों मुझसे झूठ बोलती हो ?' कह दिया तो ? सीता की आँखों में टी.वी. स्क्रीन की भाँति वही दृश्य आने जाने लगे। ब्राह्मणने अपनी दानशीलता का परिचय दिया- 'सीताजी को एक सुन्दर सी साड़ी उपहार में देना चाहता हूँ। चलो सीता अपनी पंसद चुन लो।' सभी एक साथ कहने लगे – ' हाँ हाँ, ठीक है, चुन लो एक नंबर की साड़ी।' सीता भीतर कहीं कुछ डरी सी भी थी। उसने मना भी किया था – 'मेरे घर में बहुत साड़ियाँ हैं, शादी की साड़ियाँ भी हैं। नई साड़ी लेकर मैं क्या करूँगी ?' 'एक भाइ का उपहार सीता। नए डिजाइन की एक साड़ी चुन लो। मुझे भी तो जिंदगी भर याद हो..।' वही ब्राह्मण की आवाज फिर आई थी। इस आवाज में सीता को हार्दिकता मिली, सद्भाव मिला, स्नेह दिखाई दिया। आसमानी रंग की जॉर्जट साड़ी पसंद किया उसने। तकरीबन हजार रुपये खर्च हो गए साड़ी में। 'मेरी तरफ से यह काश्मिरी शॉल सीता जी को। लो चुन लो एक सुंदर शॉल।' अचानक क्षत्रिय की आवाज सुनाई दी। 'नहीं, मैं नहीं लेना चाहती।' प्रतिवाद के स्वर में उसने कहा। लेकिन दूसरी सामूहिक आवाज ने उसे चुप करा दिया – 'हाँ..हाँ.. साड़ी के लिए मैंचिंग शॉल चाहिए। उपहार ले लेना सीता जी।' फिर वह शॉल चुनने को विवश हो गई। उसने एक काश्मिरी शॉल चुना, ओढ़ा और अपने आपको नेपाल सुंदरी कल्पना करने लगी। साड़ी तो थी ही, ऊपर से शॉल भी। कुछ पलों के लिए तो उसे लगा वह साड़ी उसे बुरी तरह से जकड़ रही है। लगा कहीं महाभारत की द्रौपदी तो नहीं हो रही है ! उसने आँखें मूँदी। बंद आँखों के भीतर अपने पति नरेश का चित्र आया। शादी को बरस भर भी नहीं हुए हैं। अच्छी तरह से दोनों के दिल खुल भी नहीं पाए हैं। आज क्या अनर्थ होने जा रहा है, हे भगवान् ! सीता को लगा यह कहीं का मोहजाल है, या कोई दुःस्वप्न जो वह भूलना चाहती है। कपड़े की गठरी निकालने के लिए वह रसोईघर की तरफ बढ़ी। किसी अज्ञात भय से उसका दिल काँप उठा। उसे लगा कि उस गठरी को मायके भेज देना चाहिए। फिर मायके से ला सकती है, यह कहकर की माँ ने दिया है। उसे लगा वह कपड़े की गठरी पत्थर की भारी गठरी बन गई है। उसने गठरी को खटिया के नीचे सरका दिया और थोड़ी आश्वस्त हुई। अब बारी शूद्र की थी। वे सब क्या थे, सीता नहीं जानती थी। पर यह सब उनका प्रभाव था उसपर। 'मुझे भी तो सीता जी को सेवा करने का मौका मिलना चाहिए। कम से कम एक ब्लाउज और पेटिकोट तो मैं दे ही सकता हूँ।' 'माफ करें। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं और कुछ नहीं ले सकती।' सीता अर्धबेहोसी में ही चिल्लाई थी। शायद उसकी दृड़ और बड़ी आवाज के कारण कुछ देर सन्नाटा छाया रहा। उस संत्रास से उसे उसी आवाज ने मुक्ति दी – 'तो सिर्फ मैं ही सौतेला हो गया सीता जी के लिए ? दूसरों से वह ले रही हैं मुझसे नहीं। मैं अछूत जो हूँ।' अब उस तनाव को कम करने के लिए सीता को मैंचिंग ब्लाउज और पेटिकोट भी लेने पड़े। जोगबनी का वह दूकान अब दूकान न होकर उपहार वितरण केंद्र जैसा हो गया था। सभी अपनी पंसद के कपड़े ले चुके थे और सीता के पास भी कपड़े की गठरी आ गई थी। बाहर गाड़ियों और रिक्सों की आवाजों से डर लग रहा था। लगता था पानी भी बरसेगा। सभी जल्दी में दिखते थे। साहित्यकारों का समूह दूसरे दिन सबेरे ही काठमांडू प्रस्थान करनेवाला था। सीता उठने ही वाली थी कि पहले प्रस्ताव रखनेवाला बोल उठा – 'उपहार का प्रस्ताव मैंने ही रखा और मैं ही उन्हें कुछ न दे पाऊँ ? यह कहाँ का न्याय है ?' 'हाँ,...हाँ.. यह तो बड़ा अन्याय हुआ। उसी ने बात शुरू की और वही कुछ न दे...।' एकबार फिर आवाजें एकसाथ आईं। सीता उठ चुकी थी पर फिर उसे बैठना पड़ा। 'सीता जी के लिए सेट पूरा करने के लिए सिर्फ एक पैंटी और ब्रा की जरूरत है।' दूसरी आवाज थी – 'शृंगार का सामान भी तो है !' 'वे सब तो इस दूकान में नहीं न है। बाद में वहीं से दूल्हन बनाकर भेजेंगे ना।' इन्हीं आवाजों में कहीं खो गई सीता। उसे लगा वह दुष्ट रावणों से घिरी हुई है। देश के प्रतिष्ठित लेखक- कलाकारों के असली चेहरे उसके सामने थे। लगा वह कौरवों के बीच की द्रौपदी है। वह गठरी खटिया के नीचे है और वे आनेवाले हैं। सीता हड़बड़ा गई। उसने कोई बड़ा अपराध तो नहीं किया था। फिर क्यों इतना डर रही है वह ? फिर भी, मर्दों का मन, क्या कहा जा सकता है ? उसने पीड़ादायी उस गठरी को खटिया के नीचे से निकाला और पलंग के तकिए के नीचे घुसेड़ दिया। अब तकिया ऊँचा दिखाई देने लगा था। 'सासू माँ के लिए हरितालिका का उपहार' क्यों न ऐसा कहूँ ? फिर 'माँ के लिए लाई हूँ।' या गड्डे में ही गाड़ दूँ। उसे लगा वह कपड़े की गठरी किसी लाश कें मानिंद है। उस आदमी की लाश जैसी है जिसे कुछ देर पहले ही मारा गया हो। सीता अपने आपको मजबूत बनाना चाह रही थी। कभी सोचती – 'सबकुछ सचसच बता दूँगी। मैं आखिर निर्दोष ही तो हूँ। दोष कुछ है तो मेरी एन.जी.ओ की नौकरी और साहित्यकारों के समूह के साथ उनकी गाईड बनकर जोगबनी तक जाना, नहीं तो..।' नहीं तो कुछ नहीं। परंतु ब्रा और पैंटी के प्रसंग के साथ वह चौंक गई। वह आत्मपीड़ा से अर्धबेहोसी में ही चिल्लाई – 'आप लोगों नें मुझे समझ क्या रखा है ? मैं क्या लगती हूँ आप सब की ?' सीता ने अनुभव किया वह ब्रा और पैंटी से साथ नंगी हो रही है। उसे लगा सारे पुरुष उसे नंगी करने में तुले हैं। बेइज्जत करने के लिए तैयार हैं। 'यह तो सेट में आ कुछ ही पलों में ब्रा और पैंटी भी उसकी गठरी में पहुँच चुके थे। सीता को लग रहा था ब्रा और पैंटी उसे व्यंग कर रहे हैं। विद्रोह की छोटी सी आवाज वहीं कहीं गुम हो गई थी। लज्जा, घृणा और भय ने उसे एकसाथ आ घेरा। उसे लगा वह लक्ष्मण रेखा पार कर चूकी है। 'यह भी एक तजूर्बा है जिंदगी का ....' सीता ने सोचा। लेकिन लौटते वक्त ब्रा और पैंटी उसे काँटे चूभोते रहे। उसका किराए का मकान नजदीक आ गया था। उसने दीवार में लगी घड़ी देखी। पाँच बज चुके थे। सीता ने अनायाश अपने आपको उसी गठरी में तबदील पाया। कॉलबेल की आवाज आई। शायद वे हैं। सीता फिर हड़बड़ाकर वह गठरी निकालने लगी। अचानक गठरी हाथ से निकल गई और कपड़े फर्श पर गिर पड़े। साड़ी, पेटिकोट, ब्लाउज, शॉल, ब्रा और पैंटी ईधरउधर बिखर गए। सीता ने चौंककर दरवाजा खोला। पति भीतर ढुके और स्वाभाविक स्वर में बोले – 'आज बहुत थका हूँ सीता। भूखा भी हूँ। कुछ नास्ते की व्यवस्था करो।' सीता कुछ बोल नहीं सकी। उसे लगा उसकी नारी अस्मिता और नारी स्वाभिमान वहीं बिखरा पड़ा है। ¬¬¬ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी मुक्तिदेवी ? आर.आर. चौलागाईं शादी के पहले। एक समारोह की वक्ता। भाषण का सारांश- हम औरतों को बचपन में बाप शाषन करता है, शादी के बाद शौहर और वृद्धावस्था में बेटा शाषन करता है। बहुत हो चुका, अब इसे तोड़ना चाहिए। शादी के वर्षों बाद बेटी को समझा रही है - ज्यादा घूमना नहीं। अनुशाषन में रहना। पिताजी का कहा मानना। बाद में पराई हो जाओगी। पति का कहा मानना। बूढ़ी हो जाओगी, अशक्त हो जाओगी, बेटे का दिल मत दुखाना। इतना जान लोगी तो कभी दुःख नहीं झेलने पड़ेंगे। ¬¬ नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
? मिश्र वैजयंती
लगा वह किसी गहरे ताल में डूब रही है, मछलियाँ उसे कुतर रहीं हैं। बाहर आने पर बिच्छूओं के झुरमुट में उलझ पड़ी। उनके डंक से उसके पूरे बदन
में जलन हुई।
उलट पलटकर देखना चाहती थी वह। फिर वो आ गए तो ? क्या कहूँगी ? क्या हुआ और क्या नहीं हुआ ? उनकी संभावित आवाज से वह चौंक सी गई – 'क्या करूँ कभी तुम्हें ढंग के कपड़े दे नहीं पाया। तुम्हें इन कपड़ों के लिए दुनियाभर के लोगों को गुहारना पड़ता है।' वो आवाज और भी स्पष्ट होती गई – 'जिन्होंने तुम्हें ये सब दिए हैं उन्हीं के साथ क्यों नहीं चली जाती ?'
नल में नहा रही युवतियों पर पत्थर फेंकता है, फिर आकाश से उफ्रौले
गिरते हैं। उसे लगा सारे के सारे पुरुष उसी कहानी के पात्र हैं। सभी लाटोबुंगो
हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि लाटोबुंगो
पत्थरों से मारता था आजकल ये ब्लाउज और पेटिकोट से तरुनियों को मारते हैं, अन्यथा रत्तिभर फर्क नहीं है उस कहानी में और आज की इस कहानी में।
में तबदील हो गए। सीता उन सबको याद करने की कोशिश करने लगी थी। वे पाँच जाति के थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और एक वर्णशंकर। प्रस्ताव रखनेवाला था वर्णशंकर। दूसरों से जवान और हैंडसम। वही टोक बैठा था – 'आज हमारी गाईड सीताजी
को उपहार दिया जाए। इस भरी धूप में उन्होंने हमारे लिए इतना जो किया है।'
रहा है। फिर तुम क्या ब्रा और पैंटी नहीं पहनती ? इसमें बेइज्जती की बात कहाँ से आई ? सिर्फ एक सेट की बात है....।' एक गंभीर आवाज थी।
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Friday, August 14, 2009
अंक चौबीस से
आँसू खत्म होने पर ? कृष्णभूषण बल कभी कभी भावुकता से छलकते थे कभी कभी विरह और व्यथा में भी रिसते थे एकांत के दोस्त जैसे थे आँसू आँखभर पता नहीं चला कब खत्म हो गए अब तो सूनी आँखें जलने को तैयार हैं अब तो उन्हीं आँखों से हाहाकार उबलकर बह रहा है अब तो उन्हीं आँखों से खून के छिंटे टपकने के लिए तैयार हैं स्वयंभू की आँखें, होशियार !! हारना न जाननेवाले मनुष्यों के स्वाभाविक स्वभाव ऐसे आँखों में न उतरे तो आँसू सुख चुके आँखों से ऐसे उत्पात होने लगे तो कहीं एक दिन आँखें न उड़ जाएँ कहीं एक दिन देश न बह जाए। *** नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी काला आदमी --अमोद भट्टराई एक रंगीन पर फटा पुराना कपड़ा हिलाकर वह हमें रोकने की कोशिश कर रही थी। मेरा ड्राइभर उस कपड़े को और रास्ता भूले लोग जैसे छटपटाती उस 20-22 की युवती को नजरअंदाज करते हुए आगे बड़ गया। तुरंत उसने कुछ सोचा होगा मेरे चेहरे को एकबार देखकर फिर आगे की तरफ देखते हुए उसने कहा-"इधर लोगों को क्या हुआ है ? क्यों सब के सब गाड़ी रोकना चाहते हैं ? ऐसे तो 10 घंटे का रास्ता 15 घंटे में भी नहीं काट सकते.....।" पर पिछले आठ महिने से मैं इस इलाके में रह रहा था और इस दौरान ऐसी घटना मेरे लिए पहली बार घटी थी। मैंने अपने सीट से थोड़ा सरककर और गर्दन थोड़ा मोड़कर पीछे की तरफ देखा। वह अभी भी कपड़ा हिला रही थी और गाड़ी के पीछे दौड़ रही थी। अब मैंने पूरे शरीर को घुमाकर उसे देखा। कच्चे रास्ते में धूल की कमी नहीं थी। उसी धूल को फककर वातावरण धूमिल करने के लिए हमारी गाड़ी के चार पहिए आपाधापी कर रहे थे। मैं उस युवती के चीत्कार तो नहीं सुन सकता था पर मुझे लगा कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है। मैंने ड्राईवर से गाड़ी झट रोकने के लिए तो नहीं कहा पर धीरे से अपना दायाँ हाथ उसके कंधे पर रख दिया। पता नहीं उसने क्या समझा, गाड़ी को धीमी कर धीरे से रोक दिया और मेरी ही तरह आइने से पीछे देखने लगा। जब हमारी गाड़ी रूकी तो उस युवती ने उस कपड़े को अपने शिर पर बाँधा और हमारी गाड़ी की तरफ दौड़ी चली आई। उस वक़्त तक मैं और ड्राईवर अपनी अपनी पूर्वावस्था में आ चुके थे। वह युवती सुंदर थी। पर उस वक्त मुझे वह किसी हार से टूटे हुए मोती की तरह लग रही थी। मैंने आगे का ग्लास सरका कर पूछा - "क्या हुआ ?" मेरे मुँह से शब्द छुटते ही उसने लाल चेहरे से कहा- "भैया मेरी मदद करें। आज फिर विस्फोट हुआ, मेरा शौहर जख्मी है, समय पर हस्पताल नहीं पहुँचाया गया तो मर जाएगा। कृपया मेरी मदद करें।" मैं यहाँ के लोगों में दूसरे विश्वयुद्ध बाद आए सामाजिक परिवर्तन के विषय में अनुसंधान में आए शोधार्थी का सहायक बनकर आया था और फिर अपने लोगों से बातचीत के अलावा पत्र व्यवहार हुए भी महीनों हुए थे, ऐसे वक़्त मे उस युवती के भावनात्मक सम्बोधन 'भैया !' ने मुझे सहसा पिघला दिया। मैं जल्दी से दरवाजा खोलकर बाहर निकल आया। "कहाँ है तुम्हारा पति ? फिर हस्पताल पहुँचने में तो और सात-आठ घंटे लग जाएँगे।" मैंने कहा। "जितने भी लग जाएँ, कृपया मेरी मदद करें। इस रास्ते में गाड़ी अब कितने दिनों बाद दौड़ेगी मैं कह नहीं सकती .....कृपया मेरे शौहर की जान बचाएँ।" वह रूवांसी होकर दो हाथ जोड़े हमसे बिनती कर रही थी। "ठीक है, बैठो गाड़ी में ..... पहले तुम्हारे शौहर को गाड़ी में ले लें और फिर हस्पताल चलेंगे।" मैंने कहा और सस्नेह उसका शिर सहलाया। मेरे इस निर्णय पर सहसा वह भावविभोर हो रोने लगी। मैंने धीरे से उसकी बाँह पकड़कर गाड़ी में बिठाया। और सच ! मुझे लगा, स्नेह की भाषा पढ़कर भावनाएँ बाढ़ बनकर आंखों के जरिए बाहर आ गईं हैं। वहाँ से हटकर उसी के इसारे को नापते हुए हम मूल रास्ता छोड़कर करीब पाँच किलोमीटर भीतर की किसी निर्जन स्थान की तरफ चल दिए । गाड़ी में ही वह मुझे उसके शौहर के घायल होने वाकया दे चुकी थी। वह लकड़ी लेने और शिकार के लिए जंगल में गया था तभी बारूदी सुरंग विस्फोट हो गई थी और वह घायल हो गया था। पिछले हप्ते ऐसे ही सुरंग के फटने पर 15 लोग एक ही जगह ढेर हो गए थे। इसबार उसके पति की जान बची थी, इसलिए वह संतोष प्रकट कर रही थी। पाँच किलोमीटर का उबड़-खाबड़ रास्ता तय करने के लिए हमें तकरीबन एक घंटे लग गए। गाड़ी थमने पर मैंने उसका नाम पूछा- "श्रीमान् मुझे च्यांटिनी कह सकते हैं।" मैं थोड़ी देर के लिए चौंक गया। कम्बोडिया के इस निर्जन स्थान पर भी अपने देश के गांवघर जैसे ही नाम ! अपने भाईबहनों के नाम ! गाड़ी से उतरकर वह झोंपड़े की तरफ बढ़ी। मैंने जो देखा वह मेरे सोच के बिलकुल विपरीत था। मैं तो वहाँ संवेदनाओं के स्वर मितली करनेवाले लोगों की भीड़ की आस लगाए बैठा था। पर वहाँ कोई नहीं था। मैंने देखा झोंपड़े के बाहर एक आदमी लट्ठे की तरह जमीन पर पड़ा हुआ है। कुछ देर के लिए मेरे होश ठिकाने नहीं रहे....उस दृश्य को सादृश्य करने में मुझे कुछ देर लगे। उसके दोनों पैर गायब थे। फिर गौर से देखा, उसका एक हाथ भी नहीं था। हाथ और पैर जहाँ से छिन गए थे वहाँ से मांस के लोथड़े लटक रहे थे। खून भी जम कर थक्के में परिणत हो गया था। मेरी आँखें अनजाने में ही कुछ देर के लिए मूंद गईं। पर भगवान का नाम ले नहीं सका। च्यांटिनी का पति पीड़ा से कराह नहीं रहा था, न ही तड़प रहा था। मैं आश्चर्यचकित होकर खुद से सवाल कर बैठा- आदमी ऐसे भी जी सकता है ? पीड़ा झेलते झेलते वह शायद आदी हो गया था। शायद मेरे सवाल के जवाब में कभीकभी पलकें हिला रहा था। "बारूदी सुरंग के विवेकहीन प्रयोग से हम गरीब ही क्यों कष्ट झेलने को बाध्य हैं श्रीमान् ?" लगा च्यांटिनी का पति मुझे मौन सवाल कर रहा हो। मैं फिर चौंक गया। 'सच ! सुरंग विस्फोट कराकर जो महामानव बनना चाहते हैं, क्या वे इस निर्दोष चेहरे के मौन सवालों का जबाव दे सकते हैं ? क्या यह अब जीवन मूल्य का बोध कर पाएगा ? क्या यह फिर से पूर्ण मानव हो पाएगा ?' मैं खुद पर सवालों का बौछार कर रहा था। "श्रीमान् ! आप कहाँ खो गए ?" च्यांटिनी की आवाज सुनकर मैं फिर चौंक गया। "अब उसे गाड़ी में रखें श्रीमान्, कृपया मेरी मदद करें।" उसने अपने पति का शिर उठाते हुए कहा। "यहाँ गाँववाले नहीं हैं, च्यांटिनी ?" मैंने आश्चर्य व्यक्त किया। "श्रीमान्, पहले यहाँ गाँववाले थे, पर वे मेरे पति को यहाँ पहुँचाकर चल दिए। वे इधर ही बैठे रहे तो उनके घर के चुल्हे कैसे जलेंगे ?" च्यांटिनी ने साफ और निश्चल जवाब दिया। "यहाँ के लोगों में शायद मानवता नाम की कोई चीज बाकी नहीं रही।" शायद मैंने वो बात कह दी जो नहीं कहनी चाहिए थी। च्यांटिनी का चेहरा नीला पड़ गया । वह बोली- "श्रीमान्, मानवता तो उनमें नहीं है जो साफ कमीज पहनकर हम जैसे निर्दोष लोगों को बलि का बकरा बनाते हैं। अपने पाप कर्म दूसरे के शिर मढ़ना मनाही नहीं है, इसलिए पाप किए चले जाते हैं।" "विश्वास में सबकुछ है, पर बहस में कुछ नहीं। जाने दो, श्रीमान् से बहस मत करो च्यांटिनी..... बल्कि मुझे हस्पताल जल्दी पहुँचाओ।" क्षत्-विक्षत् शरीर लिए मौत के दरवाजे पर खड़े च्यांटिनी के पति ने पीड़ाभरी ओजस्वी आवाज में कहा तो हम सब संयमित हो गए। तुरंत मुझे ऐसा लगा जिस तरह दाँतो के बीच पड़े जीभ को दाँतों द्वारा काटे जाने से बचाने के लिए कुशलता पूर्वक चलाना जरूरी है, उसी तरह मुझे अपने अफसरी अंदाज से नीचे उतरकर ठीक से बोलचाल करने के लिए च्यांटिनी का पति मुझे समझा रहा हो। .....उसको उठाने के लिए मैं धीरे से आगे बढ़ा। मेरे साथ ड्राइवर भी आ गया था। हम तीनों ने मिलकर उसे उठाया और गाड़ी के पिछले खंड में होशियारी से रखा। च्यांटिनी पिछे बैठ गई पति के साथ। हमें हस्पताल पहुँचने में आठ-नौ किलोमिटर का काला रास्ता तय करना था !! ³³³ नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
Posted by कुमुद अधिकारी at 10:02 PM 0 comments
अंक तेईस से
तुम्हारे शव के सामने - ज्योति जंगल जब तुम्हारी साँस निकल गई तुम्हारे पलकों को ढकने के बाद मैं अपने मन की अग्नि में झुलसने लगी। छोड़ शरीर मेरे सामने किस यात्रा पर निकले हो तुम ? मनुष्यों का यह सुंदर संसार या खुद मुझे देख सकते हो या नहीं ? तुम्हारे साथ ही छुट गई लोभ की लाठी बुझ गई प्यार की अग्नि जल्दवाजी में उठ गया है वास सोए हुए होंठ थके हाथ वैसे ही नतमस्तक हुए हैं जैसे मैं हूँ तुम्हारे शव के सामने। जीवन का प्रकाशित सत्य मैं पहली बार महसूस कर रही हूँ नजदीक से सोच रही हूँ तुम्हारी मुश्किलें मालूम कर पाए या नहीं चलने के लिए उधर के रास्ते उड़ने के लिए आकाश या डूबने के लिए पाताल की परतें ? मैं तो वारिस भर हूँ तुम्हारे शरीर की कैसी होगी तुम्हारी मृत अनुभूति ? -- मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी मकई का खेत --रक्ष राई उस समय घर पिछवाड़े एक खेत हुआ करता था जिसमें मकई के पौधे लहरा रहे होते। निष्ठुर मकई का खेत। मुझे मकई का खेत बिलकुल पंसद नहीं। इसी मकई के खेत की बजह से मुझसे माँ छिन गईं। उस दिन। घर के चारों ओर लोगों की भीड़ लगी हुई थी और लोग खुसुर-फुसुर कर रहे थे। एक अपराधिन की तरह शिर एक तरफ झुकाए मेरी ठीक उसी तरह जैसे बाबा परदेश जाते वक्त माँ कहा कहा करती थी- "सामान पुरे ले लिए कि नहीं ? खर्चा तो होगा ही ?" माँ बिन कुछ कहे मूलद्वार से बाहर निकल गईं। मुझे लगा, इसबार माँ की बारी। "बाबा, माँ कब लौटेगी ?" भीड़ थोड़ी छंट गई थी सो मैं पूछ बैठा था। "कभी नहीं ।" "क्यों बाबा ?" "तेरी माँ ने सब कुछ बिगाड़ दिया।" तब रोया था मैं माँ के प्यार से। अब माँ यहाँ नहीं थी- वे घर बाहर भीतर, मकई के खेत में, जहाँ कहीं भी और हमारे भीतर थीं। रात में बाबा ने दूसरे कमरे में बिस्तर लगाया। मैं और बाबा माँ के कमरे में ढुके। बड़े से आइने के सामने टेबिल पर माँ के सब शृंगार के सामान थे। टेबिल पर माँ की तसवीर हँस रही थी, जिस को देखकर मैं रो रहा था। मैं बिस्तर पर चढ़ गया था और माँ को याद करके रोने लगा था। बिस्तर पर तो माँ ही माँ थीं। रजाई और तकिए से माँ की भीनी ख़ुसबू आ रही थी। शायद मैं बहुत रोया था, और बाबा के संग सो गया था। दूसरे दिन। बाबा और मैंने मिलकर माँ के कपड़े और साड़ियाँ जमा करके तीन सुटकेशों में बंद कर दिए। माँ के जूते और सैंडिलों से ही दो बोरे भर गए। दिन भर बाप बेटे मिलकर माँ की तसवीरें जो दीवारों पर लगाए गए थे, को उतारा। बाबा को मैंने एल्बमों से माँ के फोटोग्राफ्स निकालने में मदद किया। घर एकबार फिर गहने और शृंगार बिहीन माँ के जैसा दिखाई दिया।( जैसे थी माँ घर से चलते वक्त) मैं कुछ समझा नहीं था इसलिए बाबा से पूछ बैठा- "बाबा हम ऐसा क्यों कर रहे हैं ?" "तुझे माँ को भूलना होगा, दिम्छा !" "क्यों ? माँ को भूलने के लिए ऐसा करना पड़ता है क्या ?" बाबा नहीं बोले। बोल नहीं सके। सिर्फ मैं बोलता रहा और फिर रोता रहा। --- पास पड़ोस की मौसियाँ मुझे देखकर शिकायत करतीं। तेरी माँ तो खराब निकली। तेरी माँ ज्यादा बोलती नहीं थी इसलिए हम तो........। पर जो बोलता नहीं न वही.....। तेरी माँ ने मकई के पौधों को मसल दिया। मैं उन औरतों के मुँह लग नहीं सकता था और मुझे क्या असल क्या खराब़ कुछ मालूम नहीं था। मकई के पौधे मसलने क्या मतलब क्या होता ? किसलिए मसलना होता था, मैं नहीं जानता था। मैंनें जाकर मकई के खेत में देखा भी कि कैसे माँ मकई के पौधों को मसल गई है। पांच-दश मकई के पौधे मसले और कुचले हुए मिले। मैं यह सब देखकर भी नहीं जान सका क्यों ऐसा हुआ है। शायद मकई के पौधे कुचलने या मसलने पर दी जानेवाली सजा इतनी कठोर होती हो। इसलिए मुझे मकई का वह खेत अच्छा नहीं लगा। मेरी माँ को खराब़ कहनेवाले लोग भी बुरे लगे। मेरी माँ को प्यार न करनेवाले बाबा भी अच्छे नहीं लगे। माँ के बगैर यह घर भी सूना लग रहा था। और फिर एक दिन। माँ ने मकई के खेत में जितने पौधे मसले थे, उससे कहीं ज्यादा मैंने मसल दिए, तोड़ दिए। लगा पहले की ही तरह घर में लोग जमा होंगे और फिर खुसुर-फुसुर करेंगे। भीड़ उत्तेजित होगी और मैं घर से निकाला जाऊँगा और वहाँ पहुँचाया जाऊँगा जहाँ मेरी माँ है। पर आश्चर्य ! ऐसा कुछ नहीं हुआ। मेरी बदमाशी को बाबा शांत होकर देख रहे थे। मैं जब उत्तेजना से उबर आया तो देखा बाबा की आँखों में गहरे नीले पानी का तालाब दिखाई दे रहा था। "सॉरी, बाबा !" मुझे अपने किए पर पछतावा था। शायद मैं फिर रोया था, बाबा के स्नेही हाथ मेरे गाल सहलाने लगे थे। उसके बाद फिर एक दिन। बाबा एक औरत ले आए। पहले दिन। मुझे वह औरत कुछ कुछ अच्छी लगी। उसे देखकर माँ की याद आ गई थी। दूसरे दिन। बाबा ने मेरा परिचय उस औरत से कराया- "दिम्छा, अब से ये तेरी माँ है।" मैं जो आदर जानता था, 'नमस्कार' उसे चढ़ाया तो उसने मेरो गाल और ठोड़ी छुकर अपनी आवाज को चिकनी बनाकर कहा "प्यारा बच्चा !"। मुझे लगा, देखते ही देखते उस औरत की सुंदरता मेरे अंदर कहीं घट गई है। उस औरत यानि तथाकथित मेरी माँ को मैंने दिल के किसी भी कोने से माँ के रूप में नहीं पाया। वह मुझे बहुत प्यार जताना चाहती थी। पर उसका प्यार सिर्फ भावबिहीन दिखावा होता। इसलिए उसकी भाषा जरूरत से ज्यादा चिकनी-चुपड़ी होती। इसलिए वह मुझे उतना प्यार नहीं कर सकी जितना वह चाहती थी। उसके बाद उसके और मेरे बीच की दूरी बढ़ती ही गई। एक समय ऐसा आया मेरे पास बाबा की बीवी के लिए रत्तीभर प्यार भी नहीं बचा। इस का कारण उसकी बोली थी जो उसी की बिल्ली 'जिप्सी' जैसी थी, और व्यवहार भी उसी के जैसा था। ऐसे में मेरी नापसंदगी बढ़ती गई और मुझे उसकी आँखें भी बिल्ली से मिलती दिखाई देनें लगीं। वे आँखें नीली, पीली और शक से भरपूर, धूर्तता से भरपूर। दिन पर दिन मुझे वे आँखें और चिकनीचुपड़ी बातें डसने लगे, चोंच मारने लगे और जलाने लगे। मुझे असह्य होने लगा। फिर मैंने एक तीखी सुई बनाई। सोचा कुछ देर। खयाल बदल गया। फिर एक दिन मैंने उसी सुई से जिप्सी की आँखें फोड़ दी। मेरी बदमाशी पकड़ी गई और बाबा की बीवी मुझ पर बरस पड़ी। गाली और बुरे शब्दों की वर्षा करने लगी। "बच्चे काम बिगाड़ते हैं और सिखते हैं....बच्चों से बड़े वयस्कों जैसा व्यवहार तो नहीं किया जाता।" बाबा अपनी बीवी को समझाने लगे। "आपने ही इसे शिर पे बिठा रखा है, इसलिए तो यह मेरे कंधो पर चढ़ रहा है....।" उसके बाद मैं घर में अकेला होता गया। स्कूल के दोस्तों से भी अलग थलग। मुझे स्कूल जाना ही अच्छा नहीं लगता था। पर बाबा दिल न दुखाएँ, इस खयाल से जाता था। मैं पढ़लिख कर बड़ा आदमी बनना चाहता था। पर किताबों में जिधर देखो ऊधर माँ ही दिखतीं। हर पन्ने और हर अक्षर में माँ। माँ ही पढ़ता था मैं। मैं होमवर्क करना चाहता था, पर मेरे होमवर्क और नोटबुक्स माँ की तस्वीरों से भरे होते। मेरे हर अक्षर माँमय होते। "आई लभ यू मामा !", "आई मिस यू !", "कम बैक टु मी !"बी वीथ मी !"। मालूम नहीं पड़ा कब से ऐसे ही शीर्षकों पर माँ की तस्वीरें बनाकर मैंने कमरे की दीवारों पर टांग दिए। स्कूल के प्रिंसिपल साहब ने बाबा को बुलाकर न जाने क्या कहा, बाबा मेरे कमरे में आकर अवाक् रह गए। कह रहे थे, मैं बीमार हो गया। बाबा मुझे अस्पताल ले गए। अकेले में डॉक्टर ने मुझ से पूछा- "बेटा, किसे ज्यादा प्यार करते हो, बाबा को या माँ को ?" "माँ को ।" मैंने थोड़ी आसानी महसूस की ऐसा कहते हुए। उस वक्त मुझे वैसा ही लगा कि मैं बाबा से ज्यादा माँ से प्यार करता हूँ। उफ्, ऐसा कहकर कितनी भारी गलती कर दी थी मैंने। "बेटा, मैं हार गया।" मैंने पहली बार बाबा को रोते हुए देखा, वह भी मेरे कारण। मुझे माँ के यहाँ पहुँचाने की तैयारियाँ होने लगीं। "बाबा, मैं नहीं जाऊँगा, माँ को भूल जाने की कोशिश करूंगा।" मैं फिर रो पड़ा था। "दिम्छा, तुम बीमार हो। तुम्हें अच्छा होने के लिए माँ के पास जाना है।" उसके बाद मुझे माँ के यहाँ भेजा गया। माँ दुबली और समय से पहले बूढ़ी दिख रही थीं। निश्चय ही वहाँ हमारे घर जैसी सुखसुविधाएँ न हों। पर माँ की आँखों में जिस खुसी की चमक और संतोष की छाया देखी, वह हमारे घर में नहीं देखी थी। वैसे बाबा माँ को प्यार तो बहुत करते थे। माँ की खुसी के लिए ही बाबा फौज में भर्ती हो गए थे। कभी कभी घर आते वक्त माँ के लिए नए गहने, कपड़े और शृंगार के प्रशाधन लेकर आते थे। पर माँ के चेहरे पर उन सामानों की तरह ताजगी कभी नहीं दिखती थी। उस घर में माँ के बदन में पुराने कपड़े तो थे पर हमारे घर के नए सामानों की भांति उनके चेहरे पर ताजगी थी। "दिम्छा, अब ये तेरे बाबा हैं!" माँ ने नए बाबा से मेरा परिचय कराया। "हुँ ! गुड बॉय !" मेरे अभिवादन के बाद बड़ी आवाज सुनाई दी। मुझे लगा, यह हर्रा सुअर जैसा आदमी मेरा बाबा कैसे हो सकता है? मैंने देखा उसके बाल भी हर्रा सुअर के समान थे, कड़े और खड़े। उसके ऊपर बेढंग और नशीली बोली। बदन भी अकड़ा हुआ और आँखें बिलकुल सुअर जैसी। मैंने माँ के पति को कहीं से भी अपने बाबा जैसा नहीं देखा। "माँ, चलो हमारे घर चलो !" मैंने एक दिन माँ से कहा। "बेटा, मैं अब उस घर में नहीं जा सकती।" "क्यों नहीं मा ?" मैंने अपनी जीद पकड़ी। "अभी तुम नहीं समझोगे बेटा !" माँ रोयी और मैं भी रोया। "थू.....अभागे ....!"मैं माँ और बाबा दोनों को रूला रहा था। यहाँ भी माँ ने मुझे स्कूल में भर्ती करा दिया। पर शायद मैं वहाँ भी बीमार पड़ गया। मैंने बाबा को रूलाया था, यही अपराध बोध मुझे सालता रहा। पूरे स्कूल में मैं फिर बाबा को ढूँढ़ने लग गया। किताब के हर पन्नों पर बाबा मिलते, सब होमवर्कों में बाबा ही बाबा होते। मेरा दिल पढ़ने में नहीं लगता था। मेरा मन हमेशा उस गुस्सैल माँ के पति को गाली देता रहता। उस वक्त तक माँ को एक और बच्चा हो चुका था। मैं मौके बे मौके उसके बच्चे को रूला देता था। वह मुझे पिटता था। इसलिए सुअर की आँखों जैसी आँखोंवाला वह आदमी मेरा बाबा कभी नहीं बन सका। और फिर एक दिन। मैंने माँ के यहाँ हर्रा सुअर की दोनों आँखें सुई चूभोकर फोड़ दिए। उस गुस्सैल माँ के पति ने मुझे जमकर पिटा। माँ और उसके बीच उसवक्त झगड़ा भी हुआ। मैंने मेरी माँ और बाप के बीच का झगड़ा कभी नहीं देखा था। फिर भी उस हर्रा सुअर जैसे गुस्सैल आदमी को जितना प्यार करती थी मेरी माँ उतना प्यार मेरे बाबा को करते हुए कभी नहीं देखा था मैंने। "माँ, मैं बाबा के यहाँ जाऊँगा.......।" मैंने फैसला सुना दिया। "दिम्छा, हमारे पास रहो न...।" माँ मुझे फुसलाने लगीं। पर मैंने जीद नहीं छोड़ी और मुझे छोड़ने के लिए माँ हमारे घर के पासवाले चौराहे तक आ गई। "दिम्छा, अब मेरे हिस्से का प्यार भी तुम्हीं बाबा को देना, अच्छा !" मैं नहीं समझ नहीं पाया, माँ क्या कह रही थी। चूँकी माँ कह गई थीं इसलिए उस बात को मैंने मन में रख लिया। मैं अपने घर आ गया था। मुझे उतने दिनों बाद देखकर बाबा खुस हुए, मैं भी बहुत खुस था। "बाबा, मैं माँ को भूला दूँगा।" बाबा को खुस करने के लिए मैंने कह तो दिया पर देखा बाबा की आँखों में वही नीले पानी का तालाब था। घर में दादी आई हुईं थीं। उन्होंने मुझे बहुत प्यार किया। मुझे लगा दादियाँ माँ से कहीं ज्यादा अच्छी होती हैं। दादी बाबा को डाँट रही थीं। "जीते जी अनाथ कर दिया इसे...... तेरा बेटा बीमार है....शायद वह अपना होशो-हवास माँ के पास छोड़ आया है....जल्दी से दवादारू कर..... नहीं तो नहीं बचेगा मेरा नाती।" अरे मैं क्या बीमार हूँ ....? शिर, हाथ, पाँव, पेट कहीं भी तो दर्द नहीं। कहते हैं मैं मर जाऊँगा ! मरने की बात सोचकर अच्छा लगा। लगा मरने के बाद तो किसी से प्यार नहीं होता, न बाबा से न माँ से...मरने के बाद शायद माँ और बाबा की जरूरत ही नहीं पड़ती। अभी मैं................। अपने घर के छत में हूँ और सामने का खेत देख रहा हूँ। अभी सर्दी है इसलिए वहाँ मकई नहीं है। पर बरसात की मकई की फसल मेरे अंदर लहरा रही है...... मेरे अंदर मेरी माँ का प्यार उमड़ रहा है। ¬¬¬ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
माँ खड़ी थी । लंबी खुसुर-फुसुर के बाद माँ को एक अनजाने आदमी के साथ रास्ता दिखाया गया। जाने से पहले माँ को बाबा ने पूछा- "अपने सामान सब लेती जाओ, खर्चा है ?"
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Sunday, May 24, 2009
अंक बाईस से
मिलो उनसे - गोपालप्रसाद रिमाल क्यों पूनम की चाँद का इंतजार करते हो मिलना तो उन्हीं से है तुम उन्हें उन्हीं की प्रकाश में देखो तुम उनसे आज अमावस में ही मिलो। क्यो वंसंत का इंतजार करते हो तुम फूल तो नहीं ढूँढ़ रहे तुम उन्हीं की सुवास में सांस लो तुम उनसे इसी पुस की माह में मिलो। तुम उनसे आज अमावस में ही मिलो। लगता है तुम्हें कि मुलाकात में ओझा मंगल गाए क्या उनकी आवाज सुरीली नहीं ? तुम उनकी बोली में शिर हिलाकर सिर्फ ताल भर दो तुम उनसे आज ही बिन संगीत मिलो। तुम उनसे आज अमावस में ही मिलो। तुमने कल्पना में ही कभी उन्हें इंद्रधनुषि चुनरी ओढ़ा दी मोर के गले के रंग के साटन की चोली पहना दी सोच रहे होगे चुनरी और चोली लेकर मिलने जाओगे तुम उन्हें वैसे ही मिलो जैसी वो है देर न करो उनकी लाज ही उनकी चुनरी है उनके चमड़े का रंग ही चोली का रंग है तुम उन्हे ऐसे ही मिलो तुम उन्हें आज अमावस में ही मिलो। --- नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी। आत्मज्ञान ? श्रीधर शर्मा शिव-मंदिर के प्रवेशद्वार के पास एक बड़ा सा गड्डा खुदा हुआ है और पास में बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है – "सारी गंदगी मेरे लिए।" मंदिर में दर्शनार्थ आतेजाते लोगों में से एक भले आदमी की जब-जब नजर उस जगह पड़ती है उसके जेहन में एक बात आती है-'आदमी भी यदि इसी तरह उदार बन दूसरे के मन के विकार और पाप को ग्रहण कर पाता तो यह संसार सचमुच ही बहुत सुंदर होता............।' एक दिन सदा की भांति उस भले आदमी की नजर उस गड्डे में पड़ती है और वह आश्चर्यचकित हो ऊठता है.. गड्डे में कोई है....वह पास जाकर ध्यान से देखता है.... अरे यह क्या, गड्डे में तो नग्न युवती है। पहले तो वह चौंककर पिछे हटता है पर फिर उसकी जिज्ञासा उसे पास खींच लाती है। वह पूछता है- "तुम कौन हो, सुंदरी ?" "हुजुर ! मैं देह व्यापार करनेवाली वेश्या हूँ। मेरा यह अधम शरीर पाप और गंदगी की खान है। आज मैं जब ईश्वर के दर्शन के लिए आ रही थी, तब मेरा ध्यान यहाँ लिखे हुए शब्दों ने खींचा। फिर सोचने लगी – 'इस संसार में मेरे बदन से गंदा और घृणीत क्या होगा ! यह गड्डा मेरे जिस्म के लिए सबसे उपयुक्त है।' ऐसा सोचने के बाद मैंने फैसला किया...।" वह भला आदमी नग्न युवती की बात सुनता रहा और उसे टकटकी बांधे देखता रहा। वह भी सोचने लगा – "इस साधारण सी वेश्या ने संसार के शाश्वत सत्य को कितनी आसानी से समझ लिया है...... मैं ईतना विद्वान्, पढ़ालिखा कर्मनिष्ठ आदमी क्यों इस बात को नहीं समझ पाया ?" फिर वह भला आदमी अपने सब कपड़े खोल गड्डे में कूद गया। वेश्या त्रशित और आश्चर्यचकित हो पूछने लगी – "हुजुर आप यह क्या कर रहे हैं ? मेरे इस अपवित्र और गंदे शरीर के स्पर्श से आपका पवित्र शरीर कलुषित बन जाएगा।" वह भला आदमी वेश्या को बांहों में भरते हुए कामविह्वल स्वर में कहने लगा- "हे सुंदरी ! एक दूषित वस्तु को दूसरे दूषित वस्तु से किस बात का डर। आओ पाप को पाप से मिलकर पूर्ण होने दो.....।" ³³³ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी।
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Sunday, April 26, 2009
अंक इक्कीस से
दो गजलें दिलों में गुलिस्ताँ ही खिलते गए थे उसी वक़्त से हम पिघलते गए थे। तुम्हारे खतों की करामत यही थी उसूलों से जो हम फिसलते गए थे। किसी अजनबी शख़्स को देखते और भरी ख़्वाब में हम मचलते गए थे। ये दास्ताँ हमारी हमें ही सुनाकर कहे यार हम कुछ बदलते गए थे। न थी वो सयानी न थे हम दिवाने हक़ीक़त में तो हम सम्हलते गए थे। 2. बहे थे जहाँ तुम नजारा गजब था उफनती नदी तुम किनारा गजब था। सुनी रात थी धुंध थी आसमां में नहीं एक देखा सितारा गजब था। अमावस था चाँद होता कहाँ से मगर चाँद हमने निहारा गजब था। जवां जिस्म ने फासलों को मिटाया जवां धड़कनों ने पुकारा गजब था। सुबकती थीं क्या यार तुम लाडली सी तुम्हें उस अदा ने निखारा गजब था। बहाकर यह 'गंगा' जहाँ ले गई तुम गुलिस्ताँ तुम्हारा वो प्यारा गजब था। ««« रस्सी कहानी का शीर्षक - रस्सी रस्सी की भी कहीं कहानी होती है ? पर यह कहानी रस्सी की ही है- तकरीबन तीन फूट लंबी प्लास्टिक की रस्सी की। वह रस्सी हरे रंग की थी। वह अव्यवस्थित दरवाजे पर लटकी हुई थी, एक कील से बंध कर। दूसरी तरफ एक लोहे का छड़ दीवार में लगा हुआ था। दरवाजा बंद करने के लिए रस्सी को उसी लोहे के छड़ में फंसाना जरूरी था। प्लास्टिक के रस्सी को छड़ में फसाने में दिक्कत होती थी क्योंकि रस्सी चिकनी थी। इसलिए जो भी अंदर होते थे उन्हें हरदम चौकसी बरतनी पड़ती थी-अचानक कोई दरवाजा न खोल ले। चौकसी इसलिए बरतनी पड़ती थी क्योंकि वह दरवाजा पूर्णमान के घर के संडास का था। चौकसी भीतर बैठनेवालों को ही नहीं बाहर से भीतर जानेवालों को भी बरतनी पड़ती थी। गीत गुनगुनाते हुए जाओ नहीं तो पैर पटकते हुए। धीरे से दरवाजा खोला तो दोनों को आफ़त। अब आप ही कहें- पूर्णमान के अंदर रहते यदि उसकी बहू ने दरवाजा खोला तो ? मां भीतर पायखाना कर रही है और बेटे ने दरवाजा खींच लिया तो- एक आशंका तो बनी रही न ! फिर भी तीन फूट लंबी हरे रंग की रस्सी लटक रही है- निस्प्राण। पूर्णमान के लिए काम चल रहा है। उसके बेटों, उसकी मां, पत्नी और बेटी को भी चल रहा है। पर एक दिन जवाईं को मुश्किल का सामना करना पड़ा, वह भी ससुराल में पहले दिन। वे ससुराल आए ही थे और जब जवाईं संडास गए तो सिटकिनी नदारद ! रस्सी ! रस्सी को कहां फंसाया जाए, वे हैरान हो गए थे और रस्सी को पकड़े पकड़े ही पायखाना किया था। उस दिन जवाईं ने पूर्णमान की बेटी को उसके कंजूस होने पर टोका था और मियाँ- बीवी के बीच कुछ कहासुनी भी हो गई थी। पर पूर्णमान को कंजूस नहीं कहा जा सकता । वह अच्छे कपड़े पहनता है, अच्छा खाता है, खिलाता है। कपड़े तो पूर्णमान से ज्यादा उसकी बीवी पहनती है- पैंतीस सौ की साड़ी। उस साड़ी के लिए पैंतीस सौ देते वक़्त पूर्णमान को बहुत मानसिक पीड़ा हुई थी। कम से कम आठ बार गिना था उसने उन करारे नोटों को। यूं तो वह जो पैसे रखता था, उन्हें कितनी बार गिनता था, कहना मुश्किल है। पैसे बढ़ते भी नहीं थे, घटते भी नहीं थे। पर वह गिनना नहीं छोड़ता था। पूर्णमान जब तर्जनी को जीभ पर लगा कर पैसे गिनता था तो उसका पोता बिजू देखता रहता और कहता- "दादा ! मुझे पैसे दो न, मैं मोमो खाऊंगा।" "धत् ! कहीं मोमो खाते हैं, बहुत बसा होती है छी !" और पूर्णमान झट् पैसे छिपा लेता। "नहीं, देदो न। मैं खाऊंगा।" पोता जीद पकड़ता। दादा झट सेफ में ताला लगा लेता। हां ! मोमो इसलिए नहीं खाना है कि उसमें बसा होती है। जो भी हो, सेफ में रखे पैसे से तो हरगिज नहीं। हर सुबह एक बार पूर्णमान सेफ के पैसे गिनता है। फिर शाम को भी गिनता है। नोटों की गड्डी को बारबार सहलाता है। फिर आश्वस्त हो उठता है। फिर भी संडास के दरवाजे पर वही प्लास्टिक की रस्सी लटकी हुई है। बीवी तीन-चार हजार की साड़ी पहने टैक्सी की सवारी करती है। चल रहा है। पोता हरदम मोमो खाने की बात करता है। दादा हर बार 'बसा है' कहकर टाल जाता है। और पूर्णमान का लड़का ? वह एकदम अनूठा है। पूर्णमान ने बेटे के लिए एक कोल्डस्टोर खोल दिया है। बेटा सीधासादा है और बहू उसी के साथ दुकान में रहती है। दुकान में व्यापार अच्छा ही चल रहा है। हर शाम दुकान की आमदनी के पैसे उन्हें पूर्णमान को देने होते हैं। बेटा तो सीधा है पर बहू चालाख। दिनभर की बिक्री से आए पैसों में से वह कुछ दबा जाती है। पूरा नहीं देती घर में। चालाख है, कहती है- 'बिक्री कम हो रही है।' पर थोड़े से पैसे अपने थैले में डाल ही लेती है। बेटे-बहू भी वही संडास का प्रयोग करते हैं जिसके दरवाजे पर प्लास्टिक की रस्सी लटकी हुई है। पूर्णमान को यदि पैसे खर्च करने होते थे तो उसे मानसिक पीडा होती। घर के सब लोग जानते हैं, छोटा बिजू भी जानता है। इसलिए एक दिन बिजू ने अपने दादा से पूछ बैठता है- "दादा ! आपके पास बहुत पैसे हैं, हैं न ?" "हां हां। चूप हो जा।" पूर्णमान ने नाक सिकोड़ते हुए कहा। "क्यों सिर्फ जमा करके रखते हो ? खर्च भी करो न।" "क्यों खर्च करूं ? क्यों ?" क्रोध भरी आवाज में पूर्णमान ने कहा- "खर्च करने से तो सब पैसे खत्म हो जाएंगे।" "खर्च न करने पर उनमें सीलन आ जाएगी !" ताली पीटते हुए हंसा बिजू। पूर्णमान गंभीर बन गया। उसने अपनी भाषा में बिजू को पास बुलाया और उसका शिर सहलाते हुए प्यार जताया- "देख बिजू ! ये पैसे जमा किए हैं न मैंने तेरे लिए। बाद में तू बड़ा हो जाएगा। तूझे पढ़ना भी है। तेरा बाप तो सुस्त है....अपने पास पैसे हैं, यही विचार से ही मुझे कितना सुकून मिलता है।" बूढ़े दादा ने जब बिजू का शर और पीठ सहलाए तो वह खुसी से फुल गया। कितना प्यार करते हैं दादा मुझे, सच तो है पैसे सेफ में ही अच्छे। पर बूढ्ढा कभी जरूरत की चीज भी नहीं खरीद देता। मन पसंद खाने की चीजें भी कभी नहीं खरीद देता। बसा होती है। धत् ! आइसक्रिम चाहा तो कहता है 'ठंड लग जाएगी'। मोमो की फरमाइस की तो 'बसा होती है'। चॉकलेट मांगू तो 'दांत में कीड़े पड़ जाएंगे'। पैसे खर्च न करने के अनेक बहाने। वैसे पैसे होने से तो नहोने ही अच्छे। पर उस दिन बिजू को शिर और पीठ सहलाते हुए पूर्णमान ने बिजू को सिट्ठीवाले चॉकलेट के लिए पैसे दिए थे। पूरे दश रूपये। "मांस नहीं खाते, दिल की बिमारी हो जाएगी।" कहनेवाले बूढ्ढे ने उस दिन "लो ! कलेजा ला कर भून कर खाओ।" कहकर आधा किलो कलेजे के लिए पैसे भी दिए थे। बिजू दंग रह गया था। बकरे के कलेजे के दो टुकड़े मिले थे बिजू के दब्बू बाप को भी और वह भी दंग था। सब दंग थे। पर वह बात सिर्फ एक दिन की थी। प्रायशः पूर्णमान मांस, चॉकलेट आदि के लिए पैसे खर्च नहीं करता। पर बिजू को मोमो बहुत ज्यादा पसंद है। घर के पास ही मोमो की नयीं दुकान खुली है, और बिजू हरदम यही धुन लगी रहती है कि कैसे मोमो मिले। एक दिन मांबाप दुकान में थे। दादी से मोमो के लिए पैसे मांगे तो दादी ने 'नहीं है' कहकर टाल दिया। दादा तो देने से रहे। पर दिल था कि मोमो में ही अटका हुआ था। फिर बिजू ने एक उपाय निकाला- क्यों न घर के पुराने सामान बेचकर मोमो के लिए पैसे इकठ्ठे कर लें। घर के हर कमरे को छान मारा और पुराने अखबार इकठ्ठे किए। अखबार का छोटा सा पुलिंदा तैयार हो गया, बांधे किस चीज से ? उसने फिर हर कमरे में कुछ ढूंढ़ा जिससे अखबार के पुलिंदे को बांधा जाए पर उसे कुछ नहीं मिला। उसने फिर रस्सी जैसी कोई चीज ढूंढ़ी, हर कमरे में, किचन में, बैठक में, पलंग के नीचे, बक्से के ऊपर पर उसे कुछ नहीं मिला। अचानक उसे संडास की रस्सी याद आई, और वह इधर-उधर देखते हुए संडास की तरफ लपका। बालबुद्धि और मेहनत से उसने रस्सी निकाला और अखबार के पुलिंदे को बांधा। "खाली बोतल ! पुराने कागज !!" सुनते ही वह उछल पड़ा और अखबार ले जाकर उसे बेच दिया। बिजू को उस दिन एक प्लेट मोमो के लिए पैसे मिले। वह दंग था। मन ही मन सोच रहा था- इसलिए तो किताब में 'बल से बुद्धि बड़ी' लिखा है। --- जैसे ही बिजू ने इधर मोमो का पहला ग्रास मुंह में डाल रहा था, उधर पूर्णमान संडास में ढुक गया। अभ्यस्त हाथों से उसने रस्सी पकड़ने की कोशिश की पर उसे रस्सी नहीं मिली। चौंक गया वह। फर्स पर देखा, दरवाजे के बाहर देखा, ऊपर देखा, नीचे देखा पर रस्सी कहीं दिखाई नहीं दी। पैन के खोह तक उसने देखा। फिर वह आगबबूला हो गया- "संडास की रस्सी कहां गई ?" "रस्सी कहां गई ?" "संडास की रस्सी कहां गई ?" बीवी से पूछा उसने। "मालूम नहीं। जो भी हो, सिर्फ मुझे ही डांटते हैं।" उसने बिजू से भी पूछा जो अभीअभी घर में ढुका था। "मुझे नहीं मालूम।" अब तीनों मिलकर पूरे घर में दूसरे रस्सी की तलाश शुरू कर दिया। बिजू को तो मालूम था कि रस्सी घर में नहीं है। पर वह भी खोजने का अभिनय करने लगा। पूर्णमान और उसकी बीवी ने घर के हर कोने छान मारे एक छोटी सी रस्सी के लिए। आप कहते होंगे- "रस्सी की भी कहीं कहानी होती है ?" हां, पर उस घर में एक छोटी सी रस्सी भी नहीं मिली। पूर्णमान निराश हो चला। उसका चेहरा नीला पड़ गया। थक कर अपनी बीवी से पूछने लगा-"ओए एक तीन फूट के रस्सी के क्या दाम होंगे ?" "क्यों अब भी रस्सी की बात करते हैं ? एक सिटकिनी खरीद लाइए। बेकार में कंजूसी करते हैं।" पूर्णमान ने तय किया वह सिटकिनी ही खरिदेगा। और मैं जब कहानी का अंत करने जा रहा था तो वह हार्डवेयर की दुकान में जाकर कह रहा था- "साहू जी ! एक सबसे सस्ता सिटकिनी देना। मजबूत न होने से भी चलेगा, संडास में जो लगाना है !" **** नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
? खोलाघरे साहिंलो
1.
? किशोर पहाडी
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Wednesday, February 11, 2009
अंक बीस से
तसवीर उमंग के अनेक रंग सुख-दुःख के पसिने में घोलकर प्यार की कूची से उतारी है मन में तुम्हारी तसवीर धड़कन के मिसिल में नत्थी हो कर सबूत बन गई है तसवीर खून के हर बूंद में समा जाने के बाद जान छुडाए नहीं छुड़ता प्यार, माँगना मुझसे कभी चाहिए तो ओ मातृभूमि ! इस कोलाहलमय शहर के बीच तुम्हारे तसवीर की मूल कापी महफूज है जो मेरे शरीर के फ्रेम में। ««« मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी रास्ते ही रास्ते ? ध्रुव मधिकर्मी ग प्रसाद नेता ने देश को राह दिखाने के लिए एक रास्ता शुरू किया। पर विपक्षी नेताओं ने उस रास्ते को नापसंद किया और बात गाली गलौज तक ही सीमित न फिर म प्रसाद नेता आया और देश को दूसरी दिशा की तरफ ले जाने के लिए अलग रास्ता बनाना शुरू किया। उसके रास्ते को भी विपक्षियों ने वही हाल किया जो ग प्रसाद का किया था। इसी तरह नए रास्ते बनवाकर देश को नई दिशा देने के लिए स प्रसाद, ल प्रसाद आदि नेता आए ... आते रहे....जाते रहे। बहुत से अधुरे रास्ते बने। देश ने दसियों दिशाएँ देखी पर कोई भी रास्ता पूरा नहीं हो सका और देश किसी भी रास्तें में चल नहीं सका। वह अधूरा ही रहा। आज उन्हीं रास्तों में देश की जनता भी चल रही है, जो कहीं पहुँच नहीं रही है। ³³³ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी।
? विक्रम सुब्बा
होकर हाथापाई तक पहुँची। रास्ता पूरा नहीं हो पाया और ग प्रसाद रास्ते को अधूरा छोड़कर चला गया।
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Monday, January 19, 2009
अंक उन्नीस से
देवलोक ? मुकुल दाहाल मैं सिमेंट-सुरक्षित पर्याय में सिमेंट-सभ्य जीवन के खोखले शर्तों के चक्रब्यूह में फँसा हूँ। बिजलीवाला पर्दा चूस रहा है सुबह-शाम मेरी आँखों का पानी। सड़क के मानव-तूफान और सवारियों के समुद्र में बना हूँ मैं एक कौवा। मैं पानी का वह एक बूँद जिसे रेत पी चूका होता है। इसी बीच दूर के धूमिल गाँव से लिफाफा आया है एक चिट्ठी लेकर। चिट्ठी में तीस साल पहले का एक बालक मुझसे बतिया रहा है। वक़्त वाष्पीकृत हो गया है दूरी सिमट गयी है, भूगोल की। दो बालक हम नदी किनारों की पीठ चढ़ते हैं पानी के गालों में थप्पड़ रसीद करते हैं। त्योहार बने हैं रेत पर्व बने हैं किनारे उत्सव बने हैं पत्थर फिर देवलोक बना है जीवन। ««« मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी। दया ? नवराज रिजाल वह मुरझाया सा दिखता था। आँखों में बेबसी की छाया थी। ख़ुद खोया-सा लगता। हँसी गायब थी। वह बिछौने में पड़ा था। बीमारी के कारण चल-फिर नहीं सकता था। बेटी की आँखों में आँसू उमड़ आए। ढेरों सवाल निकले। अंत में विवश हो बेटी के आग्रह को मंजूरी दे दी। वह स्वीकारी गई। उसे नौकरी मिली। समस्याएँ हल होती गईं। दिन गुजरते गए। सूरज उगता गया, और डूबता गया। वह निरीह हो बेटी की कमाई खाने लगा। बेटी तनख़्वाह भी लाती और साथ में पेशगी भी। यह सब उसे अच्छा नहीं लगता था। बेटी को धमकाया, चेतावनी दी। लंबे अरसे बाद वह नौकरी पर जाने लगा। कल जो बेटी को पेशगी दे रहे थे वे आज उसे तनख़्वाह देने से मुकर गए। उसने कड़वाहट से कलाई मरोड़ी और कहा- "क्या मैं सोलह साल की बेटी जितना भी काम नहीं कर सकता ?" "तेरी बेटी पर तो हमने दया की थी।" "किस बात की दया ?" सवाल तो उसके पास था पर जवाब...........। ³³³ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी।
Posted by कुमुद अधिकारी at 5:46 AM 1 comments
Tuesday, December 2, 2008
अंक अठारह से
घर की आँधी ? मनु मन्जिल जब वह रूठती है, एक तूफान घर में दाखिल होता है दरवाजे-खिड़कियाँ, थालियाँ-रिकाबियाँ ऐसे बजती हैं जैसे मस्तक में दरारें पड़ जाएँगी। साड़ी का आँचल कमर में जा घुसता है बाल खुल जाते हैं बेतहासा जैसे काले बादल उठते हैं तूफान के पहले। हठात् उसकी चलने की गति बड़ती है क्रोध उसके चेहरे में गुराँस की खेती करता है। सूरज की किरणें मंद होकर घर की दीवारों में गिरती हैं आँखों से मोती लुड़काते छोटे बच्चे दूसरे गोद की ओर रूख़ करते हैं। मेरी छाती में मुह छिपाते बच्चों के साथ मैं भी कभी तो माँ बन बैठता हूँ। कुछ देर चूल्हे में ठंड जुगाली करता रहता है कुछ देर पूजाघर में लयहीन घंटी बजती रहती है। समय कुछ देर के लिए घरमें विप्लव उछालके मजा लेता है पर कुछ देर की तो बात है तूफान घरको हिलाकर जा चुका होता है फिर देखना उसके अधर में चाँद मुसकुरा रहा होता है। ««« मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी। दूसरा विश्वामित्र ? हरिहर पौडेल किसी समय में विश्वामित्र के तप से ईन्द्र का सिंहासन डोलता था। तप का प्रभाव मजबूत हुआ करता था। तप भंग करने के लिए मेनका, रंभा आदि बालाएँ अपनी उत्तेजक भावभंगिमाओं के साथ विश्वामित्र के आगे प्रस्तुत हुआ करती थीं। समय बदल गया है। दूसरा विश्वामित्र तपस्या की आवश्यकता वोध करता है। वह सोचता है- 'तप में वैसी शक्ति नहीं रही।' फिर भी वह तपस्या में बैठने का निर्णल लेता है और बरसों तक तपस्या में बैठा रहता है। व़क्त बीतता जाता है। 'किसी भी ईन्द्र ने ईस बार मेनका और रंभा को नहीं भेजा।' अब विश्वामित्रका मन विचलित होने लगा है। उसका धैर्य टूट गया है और वह तप बीच में ही छोड़ शहर की तरफ बढ़ गया है। आजकल विश्वामित्र से बचने के लिए मेनकाएँ और रंभाएँ ईधर ऊधर भागती फिरती हैं। ³³³ मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी। लेखक परिचयः जन्मः 1967 चितवन, नेपाल शिक्षाः एम.एस्सी.(भौतिकी),पी.एच.डी(जारी) कार्यः वीरेन्द्र मल्टीपल कॉलेज, भरतपुर, चितवन प्रकाशित कृतियाँ- 1. इतिवृत्त(कहानी संग्रह) 2. भौतिकशास्त्रका नोबेल पुरस्कार विजेता (विज्ञान ग्रंथ) 3. विज्ञान शब्दकोश 4. कालो उज्यालो (लघुकथा संग्रह) पुरस्कारः नारायणी वाङ्मय पुरस्कार।
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